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महाकवि वाल्मीकि जी का अपने प्रिय शिष्य भारद्वाज जी को श्री रामवशिष्ठ प्रसंग कथा सुनाना।To narrate the story of the great poet Valmiki ji to his dear disciple Bharadwaj ji, Shri Ramvasishtha.

valmiki ji

 

बुद्धपुरुषों के जीवन प्रसंग ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी

Brahmarshi Vashishtha. Life Story of Great Saints


महाज्ञानी महाकवि वाल्मीकि जी अपने प्रिय शिष्य सिद्ध पुरुष भारद्वाज जी को श्री रामवशिष्ठ प्रसंग कथा सुना रहे हैं। वाल्मीकि जी बोले हे भारद्वाज! ऐसे ही वशिष्ठजी और राजा दशरथ जी राज-दरबार में परस्पर विचार कर रहे थे कि उसी समय महान् तपस्वी महातेजस्वी विश्वामित्र जी ने अपने यज्ञ के अर्थ राजा दशरथ के गृह पर आकर द्वारपाल से कहा कि राजा दशरथ से कहो कि गाधिपुत्र विश्वामित्र आए हैं और द्वार पर खड़े हैं। द्वारपाल ने तुरंत आकर राजा से निवेदन किया हे स्वामिन्! एक बहुत बड़े तपस्वी जिनका नाम विश्वामित्र है द्वार पर आए हैं और आप से मिलना चाहते हैं।

राजा दशरथ जी के दरबार में विश्वामित्र जी का आगमन

Arrival of Vishvamitra in the court of King Dasharatha.

हे भारद्वाज! इस प्रकार जब द्वारपाल ने आकर संदेश दिया तो महा तेजवान् राजा दशरथ जो मण्डलेश्वरों सहित स्वर्ण सिंहासन पर बैठे थे तुरंत अपने सिंहासन से उठ खड़े हुए और पैदल ही द्वार की ओर चल दिए। राजा के एक ओर वशिष्ठ जी और दूसरी ओर वामदेव जी तथा अनेक सुभट की न्याईं मण्डलेश्वर स्तुति करते हुए साथ चल पड़े। जहाँ से विश्वामित्र जी दृष्टि आये वहाँ से ही राजा दशरथ पृथ्वी पर प्रणाम करने लगे। राजा का शीश जहाँ पृथ्वी पर लगता था वहाँ पृथ्वी हीरे और मोती के समान सुन्दर लगती थी। इसी प्रकार शीश नवाते राजा चल रहे थे।

राजा दशरथ जी का विश्वामित्र जी से मिलन।


महातपस्वी विश्वामित्र जी काँधे पर बड़ी बड़ी जटा धारण किये और अग्नि के समान प्रकाशमान, परम शान्तस्वरूप हाथ में बाँस की तन्द्री लिये हुए थे। उनके चरणकमलों पर राजा इस भाँति गिरे जैसे सूर्यपदा शिवजी के चरणारविन्द में गिरे थे। प्रसन्नमुख राजा बोले, हे प्रभो! मेरे बड़े भाग्य हैं जो आपका दर्शन हुआ। आज मुझे ऐसा आनन्द हो रहा है जो आदि, अन्त और मध्य से रहित अविनाशी है। हे भगवान! आज मेरे भाग्य उदय हुए और अब मैं भी धर्मात्माओं में गिना जाऊँगा, क्योंकि आप मेरे गृह कुशल निमित्त आये हैं। 

हे भगवान! आपने बड़ी कृपा की जो दर्शन दिया। आप मुझे सबसे उत्कृष्ट दृष्टि में आते हैं क्योंकि आप में दो महान् गुण हैंएक तो यह कि आप क्षत्रिय हैं पर ब्राह्मण का स्वभाव आप ने धारण किया है। दूसरे यह कि आप सभी शुभ गुणों से परिपूर्ण हैं। हे मुनीश्वर! ऐसी किसी की सामर्थ्य नहीं कि क्षत्रिय से ब्राह्मण हो जाय। आपके दर्शन से मुझे अति लाभ हुआ।

महामुनि वशिष्ठ जी का महातपस्वी विश्वामित्र जी से मिलन। 

तदोपरांत महामुनि वशिष्ठ जी महातपस्वी विश्वामित्र जी से आदरपूर्वक कण्ठ लगाकर मिले। मण्डलेश्वरों ने भी बहुत प्रणाम किये। तदनन्तर राजा दशरथ विश्वामित्र जी को भीतर ले आए और सुन्दर सिंहासन पर बैठाकर विधिपूर्वक पूजा की और अर्घ्यपादार्चन करके प्रदक्षिणा की। फिर वशिष्ठजी ने भी विश्वामित्र जी का पूजन किया और विश्वामित्र जी ने उनका पूजन किया। इसी प्रकार सर्वपूजन कर यथायोग्य अपने-अपने स्थानों पर बैठ गए।

तब राजा दशरथ प्रसन्न होकर बोले, हे भगवान्! हमारे बड़े भाग्य हुए जो आपका दर्शन हुआ। जैसे किसी को अमृत प्राप्त हो वा किसी का मरा हुआ बान्धव विमान पर चढ़ के आकाश से आवे और उसके मिलने से आनन्द हो वैसा आनन्द मुझे हुआ है। हे मुनीश्वर! जिस अर्थ से आप आये हैं वह कृपा करके कहिये और अपना वह अर्थ पूर्ण हुआ जानिये। ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जो मुझको देना कठिन है, मेरे यहाँ सब कुछ विद्यमान है।

वाल्मीकि जी बोले, हे भारद्वाज! जब इस प्रकार राजा ने कहा तो मुनियों में श्रेष्ठ विश्वामित्र जी ऐसे प्रसन्न हुए जैसे चन्द्रमा को देखकर क्षीरसागर उमड़ता है। उनके रोम खड़े हो आये और कहने लगे, हे राजशार्दूल! तुम धन्य हो! ऐसे तुम क्यों कहो। तुम्हारे में दो गुण हैं-एक तो यह कि तुम रघुवंशी हो और दूसरे यह कि महामुनि वशिष्ठजी जैसे तुम्हारे गुरु हैं जिनकी आज्ञा में तुम चलते हो।

विश्वामित्र जी का प्रयोजन।

अब जो कुछ मेरा प्रयोजन है वह प्रकट करता हूँ। मैंने दशगात्र यज्ञ का आरम्भ किया है, जब यज्ञ करने लगता हूँ तब खर और दूषण निशाचर आकर विध्वंस कर जाते हैं और माँस, हाड़ और रुधिर डाल जाते हैं जिससे वह स्थान यज्ञ करने योग्य नहीं रहता। जब मैं और जगह जाता हूँ तो वहाँ भी वे उसी प्रकार अपवित्र कर जाते हैं इसलिये उनके नाश करने के लिये मैं तुम्हारे पास आया हूँ। कदाचित् आप यह कहें कि तुम भी तो समर्थ हो, तो हे राजन्! मैंने जिस यज्ञ का आरम्भ किया है उसका अंग क्षमा है। जो मैं उनको शाप दूँ तो वह भस्म हो जावें पर शाप क्रोध बिना नहीं होता। जो मैं क्रोध करूँ तो यज्ञ निष्फल होता है और जो चुपकर रहूँ तो राक्षस अपवित्र वस्तु डाल जाते हैं। इससे अब मैं आपकी शरण में आया हूँ।

विश्वामित्र जी का भगवान् श्री राम जी को यज्ञ की रक्षा के लिये अपने साथ ले जाना।

विश्वामित्र जी राजा दशरथ जी से बोले हे राजन! अपने पुत्र रामजी को मेरे साथ भेज दो, वह राक्षसों को मारें और मेरा यज्ञ सफल हो। यह चिन्ता तुम करना कि मेरा पुत्र अभी बालक है। राम जी इन्द्र के समान शूरवीर हैं। जैसे सिंह के सम्मुख मृग का बच्चा नहीं ठहर सकता वैसे ही इसके सम्मुख राक्षस ठहर सकेंगे। इसको मेरे साथ भेजने से तुम्हारा यश और धर्म दोनों रहेंगे और मेरा कार्य होगा। इसमें सन्देह नहीं। हे राजन्! ऐसा कार्य त्रिलोकी में कोई नहीं जो राम जी कर सकें इसलिये मैं तुम्हारे पुत्र को लिये जाता हूँ यह मेरे हाथ में रक्षित रहेगा और मैं इनके सम्मुख कोई विघ्न आने दूंगा।

विश्वामित्र जी ने राजा दशरथ जी से कहा-हे राजन्! राम जी जैसे तुम्हारे पुत्र हैं, उनकी सामर्थ्य को मैं और वशिष्ठ जी अच्छी तरह जानते हैं तथा सभी त्रिकालदर्शी ज्ञानवान् भी इन्हें जानते हैं, अन्य कोई इन्हें नहीं पहचान सकता। राजन्! जो कार्य समय पर किया जाता है वह थोड़े से परिश्रम से ही सफल हो जाता है। जब रामजी यज्ञ रक्षा हेतु जाएँगे तो सभी राक्षस इन्हें देखते ही भाग जाएँगे, इनके आगे कोई खड़ा रह सकेगा। जैसे सूर्य के तेज से तारागण का प्रकाश क्षीण हो जाता है वैसे ही राम जी के सम्मुख राक्षसों का बल क्षीण हो जाएगा।

राजा दशरथ को श्री रामवियोग की पीड़ा। 

इतना सुनाकर वाल्मीकि जी बोले हे भारद्वाज! जब विश्वामित्र जी ने राजा दशरथ से राक्षसों से रक्षा हेतु राम जी की माँग की तब राजा दशरथ रामवियोग पीड़ा से पुत्रासक्तिवश चुप होकर गिर पड़े और एक मुहूर्त पर्यन्त पड़े रहे।

वाल्मीकि जी बोले हे भारद्वाज! एक मुहूर्त उपरान्त राजा उठे और अधैर्य होकर बोले-हे मनीश्वर! आपने क्या कहा? रामजी युद्ध में उतरें। वे तो अभी कुमार हैं। अभी तो इन्होंने शस्त्र और अस्त्रविद्या पूरी तरह सीखी ही नहीं। ये तो अभी फूलों की शैय्या पर शयन करने वाले और बालकों के साथ खेलने वाले हैं। इन्होंने कभी रणभूमि नहीं देखी और ही भृकुटी चढ़ा कर कभी युद्ध किया। वे भला दैत्यों से क्या युद्ध करेंगे? कभी पत्थर और कमल का भी युद्ध हुआ

(क्रमशः)


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  1. महामुनि वशिष्ठ जी के जीवन से जुड़े शिक्षाप्रद प्रसंग। Who was Guru vashishtha Ji ?
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  3. किस श्राप के कारण भगवान् श्री राम जी ने राजा दशरथ के यहाँ अवतार धारण किया ? Due to which curse Lord Shri Ram Ji incarnated at the place of King Dasharatha?
  4. भगवान् विष्णु को ऋषि द्वारा मिले श्राप को श्रीराम प्रभु के रूप में पूर्ण करना। To fulfill the curse received from the sage to Lord Vishnu in the form of Shri Ram Prabhu.
  5. राजा दशरथ का रामविरह में अत्यन्त व्याकुल होना। King Dasharatha's grief over the separation of Rama.
  6. विषयों में कुछ भी सुख नहीं है, दुःख बहुत हैं। There is no happiness in desires, there are many sorrows.

 


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