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महर्षि भारद्वाज एवं गुरु वाल्मीकि संवाद। ब्रह्माजी ने ऋषि भारद्वाज को क्या उपदेश किया ?

rishi bhardwaj


महर्षि भारद्वाज एवं गुरु वाल्मीकि संवाद -

Maharishi Bharadwaj and Guru Valmiki Dialogue-

एक समय मेरे शिष्य  भारद्वाज चित्त को एकाग्र करके मेरे पास  आये और मैंने उनको यह कथा उपदेश किया था। वे कथारूपी समुद्र से साररूपी रत्न निकालकर और हृदय में धारण कर एक समय सुमेरु  पर्वत पर गए।  वहाँ ब्रह्मा जी बैठे थे , भारद्वाज ने उनको प्रणाम किया और उनके पास बैठकर  कथा सुनाई।  तब ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उससे कहा , हे पुत्र ! कुछ वर माँग , मैं तुझ पर प्रसन्न हुआ हूँ।  भारद्वाज ने , जिसका उदार आशय था , उनसे कहा , हे भूत - भविष्य के ईश्वर ! जो आप प्रसन्न हुए हो , तो यह वर दो कि सम्पूर्ण जीव संसार - दुःख से मुक्त हों और परमपद पायें संसार दुःख से छूटने का उपाय भी बतलाओ। 

ब्रह्माजी ने भारद्वाज से कहा , हे पुत्र ! तुम अपने गुरु वाल्मीकि जी के पास जाओ। उन्होंने आत्म - बोध महारामायण शास्त्र जो संसार रूपी समुद्र से पार होने का परम पावन पुल है , निर्माण आरम्भ किया है , उसी को सुनकर जीव महा - मोह जनक संसार समुद्र से तरेंगे। अस्तु , परमेष्ठी ब्रह्माजी जिनकी सर्वभूतों के हित में प्रीति है , आप ही , भारद्वाज  को साथ लेकर मेरे आश्रम पर आये और मैंने भली - प्रकार से उनका पूजन किया।  उन्होंने मुझसे कहा , हे मुनियों में श्रेष्ठ वाल्मीकि ! यह जो तुमने वशिष्ठ महारामायण शास्त्र के द्वारा श्री राम के स्वभाव और चरित्र का कथन करना आरम्भ किया है , इस उद्यम का त्याग न करना , इसे आदि से अंत पर्यन्त सम्पन्न करना क्योंकि यही मोक्ष का सरल उपाय है और संसार रूपी समुद्र से पार करने का जहाज है।  इससे अनेक जीव कृतार्थ होंगे। 

इतना कहकर ब्रह्माजी , जैसे समुद से चक्र एक मुहूर्त पर्यन्त उठकर फिर लीन हो जावे वैसे ही अंतर्धान हो गये। इतना कहकर फिर वाल्मीकि जी बोले ,  हे राजन ! जब इस प्रकार  ब्रह्माजी ने मुझसे कहा  तब उनकी आज्ञानुसार मैंने ग्रन्थ बनाकर भारद्वाज को सुनाया।  हे पुत्र ! वशिष्ठ जी के उपदेश को पाकर इस प्रकार रामजी ने निशंक होकर विचरण किया है , वैसे ही तुम भी इसका श्रवण कर निशंक विचरण करो। 

तब राजा अरिष्टनेमी ने प्रश्न किया कि हे भगवन ! जिस प्रकार वशिष्ठ जी का परमज्ञान श्रवण कर श्री रामचन्द्र जी ने जीवन्मुक्त होकर विचरण किया , वह आत्म - बोधज्ञान आदि से अन्त तक क्रमानुसार मुझसे कहिये।  इस पर वाल्मीकि जी ने वह आत्म - बोधज्ञान सुनाना आरम्भ किया। वे बड़ी मधुर अमृतवाणी में बोले , हे भारद्वाज ! कथा पात्रों में श्रीरामचन्द्र जी , लक्ष्मण , भरत , शत्रुघ्न , सीता , कौशल्या , सुमित्रा और दशरथ , ये आठ तो जीवन्मुक्त हुए हैं और अष्टगण तथा वशिष्ठ जी और वामदेव आदि महान आत्मा भी जीवन्मुक्त हो विचरे हैं और  ये सब अद्वैत - निष्ठ हुए हैं।  इनको कदाचित अपने स्वरुप से द्वैतभाव नहीं फुरा है। ये  पद की स्थिति में तृप्त रहकर केवल चिन्मात्र शुद्ध परम् पावनता को प्राप्त हुए हैं।  इन सब पर चिदानन्द भगवान्  की महान कृपा रही है , उसी से ये सब महान आत्मायें सहज मुक्ति को प्राप्त हुई। 


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